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Adani Hasdeo
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अडानी हसदेव प्लांट ने बढ़ाई बाज़ार में अडानी ग्रुप की चर्चा
टेक्सटाइल इंडस्ट्री से अपने व्यापार की शुरुआत करने वाला अडानी ग्रुप आज हर औद्योगिक क्षेत्र में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर चुका है। मगर कुछ कारणों से अडानी ग्रुप की मुश्किलें लगातार बनी रहती है। बेबुनियाद आरोपों को चलते गौतम अडानी एवं अडानी ग्रुप आए दिन चर्चा में रहते हैं। अडानी हसदेव केस भी ऐसा ही एक मामला है जिसमें अडानी ग्रुप पर कोयला खनन को लेकर झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं। अडानी हसदेव केस में गौतम अडानी को स्थानीय लोगों के साथ विरोधियों का भी सामना करना पड़ रहा है। लेकिन अडानी ग्रुप का कहना है कि स्थानीय लोगों की बात को ध्यान में रखते हुए सभी अनुमानित मिलने के बाद और पर्यावरण संरक्षण के लिए उचित प्रिकाॅशन के साथ काम कर रहे हैं।
क्या है हसदेव अरंड वन और क्या है इसकी खासियत? छत्तीसगढ़ राज्य के कोरबा, सरगुजा व सूरजपुर जिलों के वन क्षेत्रों से मिलकर बना है हसदेव अरंड वन जो अपनी वाइड बायो डायवर्सिटी और यहाँ मौजूद हाथियों के लिए खास जाना जाता है। हसदेव वन से गुजरने वाली हसदेव नदी छत्तीसगढ़ के बड़े क्षेत्र में खेती व पेयजल का प्रमुख सोर्स है, जिससे मानव जाती के साथ ही पशु पक्षी की भी जल आपूर्ति होती है। यह वन छत्तीसगढ़ को एमपी और झारखंड से जोड़ता है और घना जंगल होने की वजह से प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर है। हाथियों की बड़ी जनसंख्या के साथ ही यहाँ कई दुर्लभ वन्य प्रजातियां भी पाई जाती हैं जो यहाँ की पहचान है। हसदेव अरंड कोल फ़ील्ड्स(HACF) लगभग 2000 स्क्वायर किलोमीटर में फैला हुआ वन क्षेत्र है जहाँ करीब 1500 मिलियन टन कोयले की खदाने हैं। परसा कोल ब्लॉक इस क्षेत्र का प्रमुख हिस्सा है खंड जिसमें अडानी इंटरप्राइजेज लिमिटेड राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम के साथ मिलकर कोयला खनन कर रही है।
जानें क्या है अडानी हसदेव केस हसदेव वन जैव विविधता के चलते 1996 तक पंचायत का अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार के अधिनियम, PESA (पंचायत एक्सटेंशन टू शेड्यूल एरियाज) Act के अंतर्गत गिना जाता था। इस वन क्षेत्र में किसी भी प्रकार के विकास के काम और अन्य कार्यों के लिए स्थानीय पंचायत की अनुमति आवश्यक होती थी। हसदेव वन की जैव विविधता को बचाने के उद्देश्य से यह अधिनियम लागू किया गया था, जिसकी वजह से हसदेव वन के परसा कोल क्षेत्र को नो गो क्षेत्र घोषित किया गया था यानी यहाँ किसी प्रकार का खनन वर्जित था। लेकिन मौजूदा भारत सरकार के कार्यकाल में अडानी ग्रुप को इस क्षेत्र में नए नियमों के आधार पर कोयला खनन की मंजूरी मिल गयी। परन्तु क्षेत्र की आदिवासी जनजाति इससे संतुष्ट नहीं, जिस पर गौतम अडानी और अनुमति अथॉरिटी ने कहा कि पर्यावरण मंत्रालय की सभी गाइड लाइन के अंदर ही यह कोल माइनिंग की परमिशन अडानी ग्रपु को प्रदान की गई है।
क्या है स्थानीय विरोध का कारण ग्रामीण एवं आदिवासी नागरिकों का मत है कि इस कोयला खनन से यहाँ मौजूद दुर्लभ वन्य प्राणी धीरे धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। साथ ही खनन से होने वाले प्रदुषण से यहाँ की आबो हवा भी बदल रही है और स्थानीय लोगों का स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। विरोध कर रहे लोगों के अनुसार 2009 में केंद्रीय वन पर्यावरण एवं क्लाइमेट चेंज मंत्रालय द्वारा इस क्षेत्र को खनन की दृष्टि से नो गो क्षेत्र माना गया था फिर अब इसे अनुमति कैसे दी जा रही है। कोयला खनन के विरोध में खड़े ग्रामीणों का मत था कि इस दौरान लाखों की तादाद में पेड़ों को काटा जाएगा जो भले आर्थिक विकास का हिस्सा हो पर हमारी नज़रों में इस क्षेत्र का एक बड़ा नुकसान है।